Sunday 7 July 2019

Amar 'Amar Vishvaas'

‘अमर विश्वास’ 

मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी लेकर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था. उस दिन सफर से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आकर एक लिफाफा मुझे पकड़ा दिया। लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देखकर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई।

‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे। 

मैंने लिफाफा खोला तो उसमें 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी

My daughter was getting married soon and I was taking a few days off to see all the arrangements for marriage.
On that day when I returned home, the wife came and caught me with an envelope.

The envelope was unknowable, but seeing the name of the sender, I had an amazing curiosity.

'Amar Vishvaas', a name that got me years passed. When I opened the envelope, there was a check and a letter of one million dollars. That's such a big amount that too in my name. I quickly opened the letter and read the whole letter in one breath.

The letter surprised me like a fairy tale.

Honorable Sir,
I am giving you a small gift to you. I do not think I'll take off the debt of your favor. These gifts are for my unseen sister. I bow to everyone at home


In my eyes, they usually swim like any movie on the old days.

One day I was flipping through my favorite magazines at a bookstore strolling in Chandigarh that my eyes lay on a boy standing near a small pile of books. He performs some persuasion from every elite person who enters the book shop, and if no response comes back he would go back to his place. I have been watching this view for a long time as a mute spectator. At first glance, it was a normal arrangement made by shopkeepers on the pavement, but the frustration of that boy's face was not normal. Every time he tries his new hope, then the same disappointment.

After watching him for a long time, I did not suppress the curiosity and stood up to the boy and stood up. The boy was selling some general science books. Looking forward to me, hope was communicated and with great enlightenment he started showing me books. I looked at that boy carefully. Cleanness, confidence on the face but costume is very simple. It was cold weather and she was wearing only a light sweater. The books were not of any use to me, yet I, like a hypnotism, asked him, 'Children, how many have all these books?'

'How much you can give, sir?'

'Hey, something you thought would have happened.'

'Whatever you give,' the boy said a little frustrated.

'How much do you want?' The boy started to understand that I was passing my time with him.

'5 thousand rupees,' the boy said in some bitterness.

'There is so much to give 500 of these books too,' I did not want to hurt her, but still spontaneously left the mouth.

Now the boy's face was worth seeing. Like many disappointments someone has sprayed on her face. Now I am sorry for what you said. I kept one hand on his shoulder and asked him in solitary words, 'Look son, do not you see me selling the book, what's the matter. Clearly tell what is needed? '

The boy then split up like that. Probably enough time was the ups and downs of disappointment now outside of his benediction.

'Sir, I've done 10 + 2. My father works in a small restaurant. My medical selection has been done. Now I need money to get into it. Some are ready to give my dad, he can not arrange anything for now. The boy said in a very good English in good breath.

'What is your name?' I asked, being charmed?

'Immortal Faith.'

You believe and make the heart smaller. How much money is needed? '

'5 thousand,' Now there was humility in her voice.

'If I give you this amount then can you get me back?' These books have so much value, but this time I asked a little laugh and asked.

'Sir, you only said that I am confident. you can believe me. I have been here since last 4 days. You are the first man who asked so much, if money was not arranged, then I would also find you washing cup-plates in a hotel, there was a possibility of his future being drowned in his voice.

What was going on in her voice was that in my mind she started swimming in the spirit of cooperation. The brain was unwilling to accept anything more than a fraud, while the voice of accepting his voice in the heart began to rise. Finally, the heart won. I took 5 thousand rupees from my purse, which I was thinking of investing in stock market, caught it. By the way, so many rupees were meant for me too, but I do not know what the temptation to get out of that money.

'Look, son, I do not know how much you have in your wish, in your will, but my heart says that you should help, therefore I am doing it. You are 4-5 years younger, my daughter is also Mini, I will buy a toy for her, 'I am raising money to Amar's saying .....

Amar was hearty! Perhaps he could not believe that tears in his eyes floated. When he touches my legs, two drops out of the eyes kiss my legs.

'Should I put these books in my car?'

'No need. Keep them with you. This is my card, tell me whenever there is a need '

She stood standing as an idol and I paused the shoulder of her, start the car and proceeded.

While driving the car, the incident was circulating in my mind and I was thinking about my play gambling, which had more uncertainty. If someone else will listen then I will not understand anything more than a passionate fool. So I decided not to tell anyone this incident.

The days passed. Amar gave me the information of admission in my medical through a letter. I found some humanity in my stupidity. In an unknown power

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मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी लेकर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था. उस दिन सफर से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आकर एक लिफाफा मुझे पकड़ा दिया। लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देखकर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई।

‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे।

मैंने लिफाफा खोला तो उसमें 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी

। इतनी बड़ी राशि वह भी मेरे नाम पर। मैंने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सारा पत्र पढ़ डाला। पत्र किसी परीकथा की तरह मुझे अचंभित कर गया। लिखा था....

आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आप को दे रहा हूं। मुझे नहीं लगता कि आप के एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा। ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है। घर पर सभी को मेरा प्रणाम।
आप का, अमर,

मेरी आंखों में वर्षों पुराने दिन सहसा किसी चलचित्र की तरह तैर गए।

एक दिन मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी मनपसंद पत्रिकाएं उलटपलट रहा था कि मेरी नजर बाहर पुस्तकों के एक छोटे से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी। वह पुस्तक की दुकान में घुसते हर संभ्रांत व्यक्ति से कुछ अनुनयविनय करता और कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर वापस अपनी जगह पर जा कर खड़ा हो जाता। मैं काफी देर तक मूकदर्शक की तरह यह नजारा देखता रहा। पहली नजर में यह फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों द्वारा की जाने वाली सामान्य सी व्यवस्था लगी, लेकिन उस लड़के के चेहरे की निराशा सामान्य नहीं थी। वह हर बार नई आशा के साथ अपनी कोशिश करता, फिर वही निराशा।

मैं काफी देर तक उसे देखने के बाद अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाया और उस लड़के के पास जाकर खड़ा हो गया। वह लड़का कुछ सामान्य सी विज्ञान की पुस्तकें बेच रहा था। मुझे देखकर उसमें फिर उम्मीद का संचार हुआ और बड़ी ऊर्जा के साथ उसने मुझे पुस्तकें दिखानी शुरू कीं। मैंने उस लड़के को ध्यान से देखा. साफसुथरा, चेहरे पर आत्मविश्वास लेकिन पहनावा बहुत ही साधारण। ठंड का मौसम था और वह केवल एक हलका सा स्वेटर पहने हुए था। पुस्तकें मेरे किसी काम की नहीं थीं, फिर भी मैंने जैसे किसी सम्मोहन से बंधकर उससे पूछा, ‘बच्चे, ये सारी पुस्तकें कितने की हैं?’

‘आप कितना दे सकते हैं, सर?’

‘अरे, कुछ तुमने सोचा तो होगा।’

‘आप जो दे देंगे,’ लड़का थोड़ा निराश होकर बोला।

‘तुम्हें कितना चाहिए?’ उस लड़के ने अब यह समझना शुरू कर दिया कि मैं अपना समय उस के साथ गुजार रहा हूं।

‘5 हजार रुपए,’ वह लड़का कुछ कड़वाहट में बोला।

‘इन पुस्तकों का कोई 500 भी दे दे तो बहुत है,’ मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था फिर भी अनायास मुंह से निकल गया।

अब उस लड़के का चेहरा देखने लायक था। जैसे ढेर सारी निराशा किसी ने उसके चेहरे पर उड़ेल दी हो। मुझे अब अपने कहे पर पछतावा हुआ। मैंने अपना एक हाथ उसके कंधे पर रखा और उससे सांत्वना भरे शब्दों में फिर पूछा, ‘देखो बेटे, मुझे तुम पुस्तक बेचने वाले तो नहीं लगते, क्या बात है। साफसाफ बताओ कि क्या जरूरत है?’

वह लड़का तब जैसे फूट पड़ा। शायद काफी समय निराशा का उतारचढ़ाव अब उस के बरदाश्त के बाहर था।
‘सर, मैं 10+2 कर चुका हूं। मेरे पिता एक छोटे से रेस्तरां में काम करते हैं। मेरा मेडिकल में चयन हो चुका है। अब उसमें प्रवेश के लिए मुझे पैसे की जरूरत है। कुछ तो मेरे पिताजी देने के लिए तैयार हैं, कुछ का इंतजाम वह अभी नहीं कर सकते। लड़के ने एक ही सांस में बड़ी अच्छी अंगरेजी में कहा।

‘तुम्हारा नाम क्या है?’ मैं ने मंत्रमुग्ध हो कर पूछा?

‘अमर विश्वास।’

‘तुम विश्वास हो और दिल छोटा करते हो. कितना पैसा चाहिए?’

‘5 हजार,’ अबकी बार उस के स्वर में दीनता थी।

‘अगर मैं तुम्हें यह रकम दे दूं तो क्या मुझे वापस कर पाओगे? इन पुस्तकों की इतनी कीमत तो है नहीं,’ इस बार मैंने थोड़ा हंसकर पूछा।

‘सर, आपने ही तो कहा कि मैं विश्वास हूं। आप मुझपर विश्वास कर सकते हैं। मैं पिछले 4 दिन से यहां आता हूं। आप पहले आदमी हैं जिसने इतना पूछा, अगर पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया तो मैं भी आपको किसी होटल में कप-प्लेटें धोता हुआ मिलूंगा, उसके स्वर में अपने भविष्य के डूबने की आशंका थी।

उसके स्वर में जाने क्या बात थी जो मेरे जेहन में उसके लिए सहयोग की भावना तैरने लगी। मस्तिष्क उसे एक जालसाज से ज्यादा कुछ मानने को तैयार नहीं था, जबकि दिल में उसकी बात को स्वीकार करने का स्वर उठने लगा था। आखिर में दिल जीत गया। मैंने अपने पर्स से 5 हजार रुपए निकाले, जिनको मैं शेयर मार्किट में निवेश करने की सोच रहा था, उसे पकड़ा दिए। वैसे इतने रुपए तो मेरे लिए भी मायने रखते थे, लेकिन न जाने किस मोह ने मुझसे वह पैसे निकलवा लिए।

‘देखो बेटे, मैं नहीं जानता कि तुम्हारी बातों में, तुम्हारी इच्छाशक्ति में कितना दम है, लेकिन मेरा दिल कहता है कि तुम्हारी मदद करनी चाहिए, इसीलिए कर रहा हूं। तुमसे 4-5 साल छोटी मेरी बेटी भी है मिनी, सोचूंगा उसके लिए ही कोई खिलौना खरीद लिया,’ मैंने पैसे अमर की तरफ बढ़ाते हुए कहा.....

अमर हतप्रभ था! शायद उसे यकीन नहीं आ रहा था, उसकी आंखों में आंसू तैर आए. उस ने मेरे पैर छुए तो आंखों से निकली दो बूंदें मेरे पैरों को चूम गईं।

‘ये पुस्तकें मैं आप की गाड़ी में रख दूं?’

‘कोई जरूरत नहीं. इन्हें तुम अपने पास रखो. यह मेरा कार्ड है, जब भी कोई जरूरत हो तो मुझे बताना ’
वह मूर्ति बन कर खड़ा रहा और मैं ने उस का कंधा थपथपाया, कार स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी।

कार को चलाते हुए वह घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी और मैं अपने खेले जुए के बारे में सोच रहा था, जिस में अनिश्चितता ही ज्यादा थी. कोई दूसरा सुनेगा तो मुझे एक भावुक मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं समझेगा। अत: मैं ने यह घटना किसी को न बताने का फैसला किया।

दिन गुजरते गए. अमर ने अपने मेडिकल में दाखिले की सूचना मुझे एक पत्र के माध्यम से दी. मुझे अपनी मूर्खता में कुछ मानवता नजर आई. एक अनजान सी शक्ति में या कहें दिल में अंदर बैठे मानव ने मुझे प्रेरित किया कि मैं हजार 2 हजार रुपए उस के पते पर फिर भेज दूं. भावनाएं जीतीं और मैं ने अपनी मूर्खता फिर दोहराई।

दिन हवा होते गए. उस का संक्षिप्त सा पत्र आता जिस में 4 लाइनें होतीं. 2 मेरे लिए, एक अपनी पढ़ाई पर और एक मिनी के लिए, जिसे वह अपनी बहन बोलता था. मैं अपनी मूर्खता दोहराता और उसे भूल जाता. मैं ने कभी चेष्टा भी नहीं की कि उस के पास जा कर अपने पैसे का उपयोग देखूं, न कभी वह मेरे घर आया. कुछ साल तक यही क्रम चलता रहा. एक दिन उस का पत्र आया कि वह उच्च शिक्षा के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा है. छात्रवृत्तियों के बारे में भी बताया था और एक लाइन मिनी के लिए लिखना वह अब भी नहीं भूला।

मुझे अपनी उस मूर्खता पर दूसरी बार फख्र हुआ, बिना उस पत्र की सचाई जाने. समय पंख लगा कर उड़ता रहा. अमर ने अपनी शादी का कार्ड भेजा. वह शायद आस्ट्रेलिया में ही बसने के विचार में था. मिनी भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी. एक बड़े परिवार में उस का रिश्ता तय हुआ था. अब मुझे मिनी की शादी लड़के वालों की हैसियत के हिसाब से करनी थी. एक सरकारी उपक्रम का बड़ा अफसर कागजी शेर ही होता है. शादी के प्रबंध के लिए ढेर सारे पैसे का इंतजाम…उधेड़बुन…और अब वह चेक?

मैं वापस अपनी दुनिया में लौट आया. मैं ने अमर को एक बार फिर याद किया और मिनी की शादी का एक कार्ड अमर को भी भेज दिया।

शादी की गहमागहमी चल रही थी. मैं और मेरी पत्नी व्यवस्थाओं में व्यस्त थे और मिनी अपनी सहेलियों में. एक बड़ी सी गाड़ी पोर्च में आ कर रुकी. एक संभ्रांत से शख्स के लिए ड्राइवर ने गाड़ी का गेट खोला तो उस शख्स के साथ उस की पत्नी जिस की गोद में एक बच्चा था, भी गाड़ी से बाहर निकले।

मैं अपने दरवाजे पर जा कर खड़ा हुआ तो लगा कि इस व्यक्ति को पहले भी कहीं देखा है. उसने आकर मेरी पत्नी और मेरे पैर छुए।

‘‘सर, मैं अमर…’’ वह बड़ी श्रद्धा से बोला।

मेरी पत्नी अचंभित सी खड़ी थी। मैंने बड़े गर्व से उसे सीने से लगा लिया। उसका बेटा मेरी पत्नी की गोद में घर सा अनुभव कर रहा था.

मिनी अब भी संशय में थी।

अमर अपने साथ ढेर सारे उपहार लेकर आया था।

मिनी को उसने बड़ी आत्मीयता से गले लगाया। मिनी भाई पाकर बड़ी खुश थी।

अमर शादी में एक बड़े भाई की रस्म हर तरह से निभाने में लगा रहा। उसने न तो कोई बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर डाली और न ही मेरे चाहते हुए मुझे एक भी पैसा खर्च करने दिया। उसके भारत प्रवास के दिन जैसे पंख लगा कर उड़ गए।

इस बार अमर जब आस्ट्रेलिया वापस लौटा तो हवाई अड्डे पर उसको विदा करते हुए न केवल मेरी बल्कि मेरी पत्नी, मिनी सभी की आंखें नम थीं। हवाई जहाज ऊंचा और ऊंचा आकाश को छूने चल दिया और उसी के साथसाथ मेरा विश्वास भी आसमान छू रहा था।

मैं अपनी मूर्खता पर एक बार फिर गर्वित था और सोच रहा था कि इस नश्वर संसार को चलाने वाला कोई भगवान नहीं हमारा विश्वास ही है।

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