छोटे-छोटे पैसे माँगना ज़रूरत नहीं, एक खराब आदत बन जाती है
आजकल हर किसी के फोन में ऐसे मैसेज आ ही जाते हैं:
“भैया 500 उधार भेज दो, अर्जेंट है…”
“यार 300 चाहिए, थोड़ी मदद कर दो…”
“दीदी 250 डाल दो, अभी देना है…”
एक-दो बार चले भी जाते हैं।
लेकिन जब यह रोज़ का रूटीन बन जाए, तो ये ज़रूरतें नहीं रहतीं —
ये पैसे का indiscipline और bad habit बन जाती है।
‘’ छोटे पैसों के बहाने
छोटे पैसों का क्या है,
रोज़ ही कोई वजह बन जाती है,
कभी PUC, कभी रिचार्ज,
कभी कोई "अर्जेंसी" आ जाती है।
पचास-सौ का हिसाब नहीं रखते,
कह देते हैं — “यार, बाद में दे दूँगा।”
पर रिश्तों का हिसाब वहीं टूटता है,
जहाँ पैसों पर भरोसा छूटता है।
ये ज़रूरतें नहीं होतीं,
ये आदतें धीरे-धीरे जम जाती हैं,
पैसे की कमी नहीं,
पैसे के अनुशासन की कमी दिखाई देती है।
छोटा सा उधार जब लौटाया नहीं जाता,
दूसरे के मन में चुभन छोड़ जाता है,
और कई बार शर्म, डर और गिल्ट
रिश्तों को हमसे ही दूर कर जाता है।
रिश्ते पैसों से नहीं चलते,
पर पैसों में साफ़गोई ज़रूरी है,
ना माँगने वालों की आदत अच्छी,
ना देने वालों की मजबूरी है।
आओ थोड़ी समझदारी सीखें,
थोड़ा अपना budget बनाएँ,
ताकि “भैया 500 डाल दो…”
जैसे संदेश रिश्ते न बिगाड़ पाएँ।
रिश्ते फूलों की तरह होते हैं,
नाज़ुक भी और कीमती भी,
पैसे का सम्मान रखोगे
तो रिश्ते हमेशा मीठे ही रहेंगे। ‘’
1. आपकी “अर्जेंसी” बार-बार कैसे हो सकती है?
हर हफ़्ते नई अर्जेंसी?
PUC, recharge, petrol, fee, grocery, EMI…
अगर हर चीज़ में दूसरों के पैसों की ज़रूरत पड़ रही है, तो समस्या पैसे की नहीं—
आदत की है।
सीधी भाषा में:
अपने पैसे मैनेज न कर पाने का रिज़ल्ट हम दूसरों पर डाल देते हैं।
2. छोटा पैसा है, इसलिए लोग वापस नहीं करते
₹200–₹500 वापस करने में क्या जाता है?
लेकिन लोग सोचते हैं:
“अरे इतना सा कौन वापस माँगेगा…”
बस यही सोच हर रिश्ते में खटकती है।
क्योंकि छोटा पैसा न लौटाना भी एक बड़ी बेइमानी होती है।
3. बार-बार माँगना आदत फूल जाती है
जब किसी को पता होता है कि “यार ये तो दे ही देगा”,
तो उधर माँगना आसान हो जाता है —
और धीरे-धीरे यह dependency बन जाती है।
ये ज़रूरत नहीं,
खुद पर कंट्रोल न होना है।
4. जिनसे पैसे माँगते हो, वो बोलते नहीं… पर महसूस ज़रूर करते हैं
लोग सामने से कुछ नहीं कहते।
लेकिन मन में यही चलता है:
“फिर पैसे माँगे…”
“ये पैसे मैनेज क्यों नहीं कर पाता?”
“वापस भी नहीं करता…”
“बस आदत बना रखी है…”
रिश्ता टूटता नहीं है,
धीरे-धीरे घिसता है।
5. बाद में लोग खुद दूर होने लगते हैं
सबसे painful हिस्सा यही है।
पैसा देने वाला धीरे-धीरे distance रखता है।
पैसा लेने वाला guilt में खुद दूर होने लगता है।
और रिश्ता खत्म हो जाता है —
कारण? बस कुछ सौ रुपये और एक खराब आदत।
निष्कर्ष: यह ज़रूरत नहीं — पैसे का अनुशासन सीखने की कमी है
बार-बार छोटे-छोटे पैसे माँगना एक पैटर्न है —
जो बताता है कि
बजट नहीं बनाया,
प्लानिंग नहीं की,
खर्चे कंट्रोल नहीं किए,
और जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दी।
ये सिर्फ financial indiscipline नहीं,
self-respect और relationship-respect का भी मुद्दा है।
रिश्ते बचाने हैं?
तो पैसे में अनुशासन सीखना पड़ेगा।
जहाँ पैसों पर कंट्रोल नहीं,
वहाँ रिश्तों पर भी कंट्रोल नहीं रहता।
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