Thursday 24 December 2020

Farmer Produce Trade and Commerce (Promotion and Facility) Bill 2020

 एक मिनट लगेगी पढ़ जरूर लियो भाई 🙏

It will take one minute to read

If you do not know about the 3 bills imposed by the government, then please do a Google search. You will get your answer in every language.

If you want to understand broadly, let me calm your curiosity about 3 bills. I will make you aware of the ground reality that you will not find in the speech of any politician.

The first thing is in the State List of the Agrarian Reform Act, the Constitution and not in the Union List. Meaning that only the state has the right to make laws on agriculture, the center cannot interfere in it. This means that all three bills are completely against the Constitution.

Now let's talk about the three bills, in reality these three bills are interlinked. Which is in every way in favor of corporate and is similar to the death of general public and farmers.

A. First Bill- Farmer Produce Trade and Commerce (Promotion and Facility) Bill 2020

This bill said that any farmer, businessman, company or organization will be able to sell any crop in the country. Mandi board should be abolished.


 Sir, there is nothing new in this. The people of Tamil Nadu are still eating the apple of Kashmir. Every fruit, vegetable, spices, pulses, oilseeds is reaching every corner of the country. Now you will say what is bad in this, then I tell you its disadvantages-

1 Mandation is still going on in some states of the country. The farmer sells his crop in the mandi and is stocked from the mandi by FCI. This is the grain that the poor are getting as PDS. And from these mandis crops reach across the country.


This bill will eliminate the mandi board and the government will stop taking food grains, because the government has already been saying that FCI is carrying food grains, we should stop buying.


Due to this the poor will also die and the jobs of millions of people will also be lost.


There is no mention of MSP in the 2 bills, meaning the MSP also gradually ends. MSP (Minimum Support Price), it is the price that the government decides before every yield to buy the crop at least at this price.


 Now how would you say? I will make it clear that when a corporate entry is made in every market, then they will rate their choice. If the farmer does not want to sell, no one will buy.


The Indian farmer is not such a big farmer that he can store the crop. Fear of harvesting, repayment of debt, bank loans, household expenses, children will have to bend before expenses and sell the crop at one and a half price.

The smart people of the corporate know that there is no way for the farmers. The farmer, who already wants to fulfill his needs by selling the crop after about 6 months waiting for the growing crop like his children, will not be able to do it.

Now let's talk on MSP. There is still MSP all over the country, yet crops are not being purchased on MSP. Look at the state of Bihar itself, the worst condition is of the farmers there.

3 Now let's talk about selling the crop in any corner of the country.

Now you tell me whether the farmer has enough money to spend thousands of rupees and take millet from Rajasthan and sell it in Bengal. First spend thousands of rupees and then there is no hope that anyone will buy the crop. When will it be sold and for what price. The farmer is forced to sell the crop around him.

Now come on corporate, this bill is made for these people. By purchasing cheaper goods from the farmers, they will be able to store and then be able to easily transport them in the law.

4 In this bill, finance was told on any land, meaning it was deliberately hidden.

If tomorrow the corporate takes loan from the bank on the lease deed of your land, then you will not be able to do anything. And if the loan is not repaid, whose land will go, you do not understand.

B Second Bill- Farmers (Empowerment and Protection) Main Assurance and Services Agreement Bill 2020

The bill is on contract farming, that the farmer should lease his land for at least 20 years, so that the standard of living of the farmers can be elevated.

Mr. sir, now tell me that for the farmer his land is everything, mother is same. If the land does not exist, will the farmer be able to live?

Now you will say that someone is forcibly taking away the land, if you wish, give it on lease or not.

I believe that some people will greedily give their land on lease, but once the knock of the corporate, even the small farmers around will be forced to give their land.

Now I will tell you its losses -

After 1 lease, the farmer will legally be like a laborer, meaning the crop that the corporate has said will be sown.

Suppose the farmer is ordered to sow maize, then he will sow maize on the entire land. Now the farmer used to sow vegetables on the fields of the farm for his small needs, this also led to the harvest and the vegetable for the home. Moreover, if the farmer has to eat corn on his own, he will have to buy it from the market, but cannot do it from his field. If there is a sugarcane crop, you will not be able to get even one sugarcane for your children.

If he does, he can be fined. Means bonded laborers on their own land.

The corporate knows that the farmer will not leave his land, he will get laborers for cheaper and the crop is also his choice.

Another advantage of this to the corporate is that by deliberately sowing a crop in an area at the will of the corporate, that crop will produce much more and the price will naturally be reduced to the farmers.

2 According to the bill, in case of any debate, it will be settled on the local administration and not in the court.

Oh yes! Another corporate

अगर आप सरकार द्वारा पर थोपे गए 3 बिलों के बारे में नही जानते है तो कृप्या गूगल सर्च जरूर करें।आपको हर भाषा में आपका जवाब मिल जाएगा।

अगर आप मोटे तौर पर समझना चाहते है, तो मैं आपको 3 बिलों के बारे में आपकी उत्सुकता को शांत करता हूँ। मैं आपको उस जमीनी हकीकत से अवगत करवाऊंगा, जो आपको किसी राजनेता के भाषण में नही मिलेगी।

पहली बात कृषि सुधार कानून, संविधान की राज्य सूची में है न कि संघ सूची में। मतलब कृषि पर कानून बनाने का अधिकार सिर्फ राज्य को है, केन्द्र इसमें हस्तक्षेप नही कर सकता। इसका मतलब यह है कि यह तीनों बिल पूर्ण रुप से संविधान के खिलाफ है।

अब बात करते है तीनों बिलों की, असलियत में ये तीनों बिल आपस में जुङे हुए है। जो हर प्रकार से कार्पोरेट के पक्ष में है और आम जनता और किसानों की मौत के समान है।

A.पहला बिल- किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (प्रमोशन और सहूलियत) बिल 2020

इस बिल मे कहा गया कि कोई भी किसान, व्यापारी, कंपनी या संस्था देश मे कही भी फसल बेच पाएगे। मंडी बोर्ड को खत्म किया जाए।


 श्रीमान जी, इसमे कुछ भी नया नही है। अभी भी तो तमिलनाडु के लोग, कश्मीर का सेब खा रहे है। हर फल, सब्जी, मसाले, दलहन, तिलहन देश के हर कोने मे पहूँच रहा है। अब आप कहेंगे कि इसमे बुरा क्या है, तो मैं आपको बताता हूँ इसके नुकसान-

1 देश के कुछ राज्यों में अभी भी मंडीकरण चल रहा है। किसान अपनी फसल मंडी में बेचता है और मंडी से FCI के द्वारा स्टाॅक हो जाता है। यही अनाज है जो गरीबो को PDS के रूप में मिल रहा है। और इन्ही मंडियो से देश भर मे फसलें पहुँचती है।


इस बिल से मंडी बोर्ड खत्म हो जाएगा और सरकार अनाज लेना ही बंद कर देगी क्योंकि सरकार तो पहले ही कहती आ रही है कि FCI में अनाज सङ रहा है, हमे खरीद बंद कर देनी चाहिए।


इससे गरीब भी मरेगा और लाखो लोगों के रोजगार भी चले जाएगे।


2 बिल मे MSP का कही कोई जिक्र ही नही है, मतलब MSP भी धीरे-धीरे खत्म। MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य), यह वह मूल्य है जो हर उपज से पहले सरकार तय करती है कि कम से कम इस मूल्य पर फसल खरीदी जाए। 


 अब आप कहेंगे खत्म कैसे? मैं स्पष्ट करता हूँ जब हर बाजार मे कार्पोरेट की एंट्री हो जाएगी तो वो अपना मनमर्जी का रेट लगाएंगे। अगर किसान बेचना नही चाहता तो कोई खरीदेगा भी नही।


भारतीय किसान, इतना बङा किसान नही है कि वो फसल को स्टोर कर सके। फसल सङने का डर, कर्ज वापसी, बैंको के लोन, घर के खर्चे, बच्चों के खर्चो के आगे झुक कर ओने-पोने भाव पर फसल बेचनी ही पङेगी।

कार्पोरेट के चालाक लोग जानते है कि किसानो के पास कोई रास्ता नही है। किसान, जो पहले से ही लगभग 6 महीने अपने बच्चों की तरह बढती फसल के इंतजार के बाद, फसल बेच कर अपनी जरूरत पूरी करना चाहता है, नही कर पाएगा।

अब बात करते है MSP पे। अभी भी पूरे देश भर मे MSP है, फिर भी MSP पर फसल नही खरीदी जा रही। बिहार राज्य में ही देख लीजिए, सबसे बुरा हाल है वहां के किसानों का।

3 अब बात करते है, फसल को देश के किसी भी कोने में बेचने की।

अब आप ही बताइए कि क्या किसान के पास इतना पैसा है कि वह हजारों रूपये खर्च कर राजस्थान से बाजरा ले जाकर बंगाल में बेच पाए। पहले तो हजारों रूपये खर्च करे और फिर उम्मीद नही कि फसल कोई खरीदेगा के नही। बिकेगी तो कब तक और किस मूल्य पर। इसी मजबूरन किसान अपने आस पास ही फसल बेच देता है।

अब आते है कार्पोरेट पर, यह बिल बनाया ही इन्ही लोगो के लिए है। किसानो से सस्ता माल खरीद कर, भंडारण करेंगे और उसके बाद कानून की ओट में आसानी से बेरोकटोक ट्रांसपोर्ट कर पाए।

4 इस बिल में कही भी भूमि पर फाइनेंस के बारे मे बताया गया, मतलब जानबूझकर छुपाया गया। 

अगर कल को कार्पोरेट, आपकी जमीन की लीज डीड पर बैंक से लोन लेता है तो आप कुछ भी नही कर पाएगे। और अगर लोन नही चुकाया तो जमीन किसकी जाएगी, समझ गये न आप।

B दूसरा बिल- किसान (सशक्तिकरण व संरक्षण) मुख्य आश्वासन और सेवा समझौता बिल 2020

यह बिल कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पर है, कि किसान अपनी जमीनों को कम से कम 20 वर्ष के लिए लीज पर दे, ताकि किसानों के जीवन स्तर को उँच्चा किया जा सके।

श्रीमान जी, अब आप ही बताइए कि किसान के लिए उसकी जमीन ही सब कुछ है, मां समान है। अगर जमीन का अधिकार ही न रहा तो क्या किसान रह पाएगा।

अब आप कहेंगे कि कोई जबरदस्ती जमीन थोङी छीन रहा है, मर्जी है तो लीज पर दे, नही तो न दे।

मैं मानता हूँ कि कुछ लोग लालचवश अपनी जमीन लीज पर दे भी देगे, पर एक बार कार्पोरेट की दस्तक से आस पास के छोटे-मोटे किसानो को भी मजबूरन अपनी जमीन देनी ही पङेगी।

अब मैं आपको इसके घाटे बताता हूँ-

1 लीज के बाद किसान कानूनी रूप से एक मजदूर की तरह हो जाएगा, मतलब कार्पोरेट ने जो फसल कही वो ही बोनी पङेगी।

मान लीजिए किसान को मक्का बोने के आदेश दिए, तो पूरी जमीन पर मक्का ही बोएगा। अभी किसान अपनी छोटी-मोटी जरूरतो के लिए खेतों की मेङ पर शाक-सब्ज़ी बो लेता था, इससे फसल भी हो जाती थी और घर के लिए सब्जी का भी गुजारा हो जाता था। और तो और अगर किसान को अपने लिए भुट्टा भी खाना होगा तो बाजार से ही खरीदना होगा, अपने खेत से नही तोङ सकता। अगर गन्ना की फसल है तो आप अपने बच्चो के लिए एक गन्ना तक नही तोङ पाओगे।

अगर ऐसा करेगा तो उसे जुर्माना तक हो सकता है। मतलब अपनी ही भूमि पर बंधुआ मजदूर।

कार्पोरेट को पता है कि किसान अपनी जमीन छोड़कर कही नही जाएगा, सस्ता में मजदूर भी मिल जाएगा और फसल भी अपनी मर्जी की।

इसका एक और फायदा कार्पोरेट को है, वो ये है कि कार्पोरेट की मर्जी से जानबूझकर एक एरिया में एक फसल को बोने से, उस फसल की बहुत ज्यादा पैदावार होगी और मूल्य स्वभाविक रूप से किसानों को कम देना पङेगा।

2 बिल के अनुसार किसी भी वाद-विवाद होने पर, उसका निपटारा स्थानीय प्रशासन पर होगा न कि न्यायालय में।

लो जी! एक और कार्पोरेट को गिफ्ट।

क्या आपको लगता है कि भारत में स्थानीय प्रशासन या जिला कलेक्टर, एक कम पढ़े लिखे और गरीब किसान की बात सुनेगा, उसे तो ऊंची आवाज में फटकार कर भगा दिया जाएगा। फैसला हमेशा कार्पोरेट के पक्ष में ही होगा, अगर ऐसा नही करेगा तो आपको पता ही है कि भारत में क्या होता है। एक काॅल और बोलती बंद।

इसीलिए किसानो को न्यायालय से दूर रखा गया है ताकि कार्पोरेट को कोई दिक्कत न हो।

3 बिल के अनुसार वाद-विवाद की स्थिति मे किसान 1 माह मे और कार्पोरेट 2 माह मे स्थानीय प्रशासन को शिकायत कर सकता है।

अगर किसान 1 महीने मे शिकायत नही करता तो, वाद-विवाद अपने आप ही निरस्त। 

मतलब किसान को 1 महीने तक चक्कर निकलवाते रहो, उसके बाद मामला अपने आप ही खत्म।

4 बिल के अनुसार किसान अपनी जमीन मे कोई हस्तक्षेप नही कर सकता। मतलब कार्पोरेट के द्वारा 20 वर्षो तक किए गए दोहन से भूमि का उपजाऊपन खत्म कर देगा। 

कार्पोरेट वर्ग बिजनेसमैन है, उन्हे जमीन की उर्वरकता से कोई मतलब नही है, उसे तो बस फसल चाहिए। लीज खत्म होने के बाद जमीन सिर्फ बंजर भूमि रह जाएगी।

अगर किसान का विवेक जाग गया और अगर किसान ने अपनी पर अपनी मर्जी से उर्वरक डाल दिया तो उसे जेल की हवा खानी पङ सकती है।

C तिसरा बिल- जरूरी वस्तु (संशोधन) बिल 2020

लो जी हाजिर है हितैषी सरकार का दिया गया तोहफा, कार्पोरेट को- जमाखोरी। 

मतलब गेंहू, चावल, अन्य मोटे अनाज, दलहन, तिलहन, आलू, प्याज आदि वस्तुओं का अब तक एक निश्चित मात्रा व निश्चित समय के लिए व्यापारी स्टोर कर पाता था। परन्तु इस बिल के बाद कोई भी व्यापारी जितनी मात्रा में, जब तक चाहे स्टोर कर सकता है।

हमारे देश में व्यापारी वर्ग इतना सक्षम नही है कि ज्यादा मात्रा मे जरूरी वस्तुओ को स्टोर कर पाए। यह बिल सीधे तौर पर कार्पोरेट के पक्ष मे है और आम जनता को निश्चित रूप से महंगाई से जूझना पङेगा।

कार्पोरेट वर्ग पहले तो किसानों की भूमि पर मनचाहे हक से मनमर्जी की फसलें पैदा करेगा, जिसे कोई कानून नही रोक सकता। फिर मनमाने सस्ते दामों पर किसानों की फसलें खरीदेगा, क्योकि निर्धारित मूल्य का कोई कानून ही नही है। उसके बाद जितना चाहे, उतना भंडारण करेगा, किसी का बाप भी नही रोक सकता।

इस बिल का ताजा नुकसान अभी आलू के भाव सुनकर ही पता लगता है, जबकि इस समय आलू की नई फसल आने के कारण भाव हमेशा कम ही रहता था। परन्तु हो उल्टा रहा है, ये उल्टी गंगा कैसे बहने लग गई।

इसका गणित मैं आपको समझाता हूँ आप जानते ही है कि हमारे देश मे सबसे ज्यादा आलू की पैदावार उत्तरप्रदेश मे होती है। आलू को कोल्ड स्टोर मे रखा जाता है और आलू के बीज के अलावा भंडारण की निश्चित मात्रा जितना ही स्टोर किया जाता था, बुवाई के समय बीज के साथ लगभग सारी फसल को कोल्ड स्टोर से बाहर निकाल कर बेच दिया जाता था। ताकि नई  फसल को कोल्ड स्टोर मे रखा जा सके।

यह पहली बार हो रहा है कि भंडारण की खूली छूट मिलने के कारण न तो पुराना आलू बाहर आया, बल्कि उल्टा नया आलू भी स्टोर हो जाएगा।

मतलब कार्पोरेट अपनी मर्ज़ी से बाजार की जरूरत को देखकर आलू बेचेगा। किसान को क्या मिला, वही कौडियों के भाव।

श्रीमान जी, किसान अपना हक माँग रहे है। किसान सिर्फ अपना ही नही, देश के हर नागरिक का हक माँग रहे है।

अगर ये तीनों बिल रद्द नही किए और लागू हो गए तो, वो दिन भी दूर नही जब आपको और मुझको एक वक्त भूखे पेट सोना पङेगा क्योंकि अनाज, दाले और हर खाद्य सामग्री इतनी महंगी हो जाएगी कि हर कोई खरीद नही पाएगा।

किसानों कि माँग सिर्फ तीनों बिलो को रद्द करने की व MSP को कानूनन लागू करने की है ताकि फसल का एक निश्चित मूल्य हो। यदि कोई उस मूल्य से कम कोई खरीदता है तो सजा का प्रावधान हो, यह गलत भी नही है। यदि हर वस्तु का MRP हो सकता है तो किसानों की खून-पसीने की कमाई का क्यो नही।

श्रीमान जी, अब आप ही बताइए कि अगर मुझे भूख ही नही है तो जबरदस्ती क्यों खाना खिलाया जा रहा है। मतलब जब देश के किसानो पर बिना किसी जरूरत के कानून थोपे जा रहे है, ये कहां तक न्यायसंगत है।

हमारे देश मे 65 फीसदी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है और कृषि से हर काम धंधा जुङा हुआ है। ऐसे में क्या किसानों को मारना जरुरी है।

श्रीमान जी, अब निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि आप इन 3 विषैले कानूनो के बारे मे जान गए होगे।

एक बात और, आपने लिखा कि इस देशव्यापी जन आन्दोलन मे खालिस्तान है, अलगाववादी है, नक्सली है। श्रीमान जी, इसमे आपका कोई कसूर नही है। जो लालची मीडिया के माध्यम से सरकार द्वारा परोसा जा रहा है, वही आप देख रहे है। गोदी मिडिया आम जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।

पर सांच कोई आंच नही।

आपने देखा ही है कि सरकार हर जगह, चाहे रैली हो या मन की बात। इन काले कानूनो का ऐसे बखान कर रहे थे, जैसे इन कानूनो के लागू होने से 1 रुपया, 70 डाॅलर का हो जाएगा।

मैं बचपन से एक बात सुनता आ रहा हूँ कि अगर किसी झूठ को बार-बार, जोर-जोर से बोला जाए। तो वह झूठ, झूठ नही रहता। लोग सच मानने लगते है। सरकार भी यह बात अच्छे से जानती है इसीलिए वो बार-बार यह राग अलाप रही है कि इस बिल से ये हो जाएगा, वो हो जाएगा। परन्तु सच्चाई सबको पता है कि सरकार एक कठपुतली की तरह काम कर रही है।

अब मैं आपका ध्यान थोङा सा जन आंदोलन की तरफ ले जाता हूँ। इस किसान आंदोलन की शुरूआत पंजाब से लगभग ढाई महीने पहले हुई। दो महीने शांतिमय धरने करने पर भी सरकार के कान पर जूँ तक न रेंगी। आखिर में निर्णय लिया गया कि केंद्र सरकार को अपनी समस्याएं सुनाई जाए और दिल्ली चलो का नारा के साथ जंतर-मंतर या रामलीला मैदान में धरना-प्रदर्शन किया जाए।

किसानों को पता था कि सरकार इतनी जल्दी हमारी बात नही सुनने वाली, इसलिए कम से कम छः महीने का राशन भी साथ मे लिया जाए। इससे पहले भी आंध्र प्रदेश के सैकङो किसान दिल्ली मे लगभग एक साल तक बैठे रहे, आखिर क्या हुआ।

 आखिरकार बेमन से वापिस जाना पङा।



निवेदन है, यह लड़ाई किसान के अस्तित्व की है, अगर आप किसान का समर्थन करते हैं, इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर कीजिए 

जय किसान

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